Sunday, 27 October 2013 0 comments

उस मृत लड़की का बयान, जिसे उसके पिता ने गोली मार दी व अन्य कविताएं : संजय कुंदन

मित्रो! संजय कुंदन हमारे समय की कविता के ऎसे हस्ताक्षर है जिनकी कविता में हमारा समय बोलता है, संजय की कविताओं में हमारे जीवन-समाज में व्याप्त आपाधापी, दोगलेपन और विसंगियों को बहुत ही पैनी दृष्टि से पकड़ते हुए पूरे उद्दाम और संवेदना से प्रकट होती प्रतीत होती है। 
’योजनाओं का शहर’ काव्य संग्रह के प्रकाशन पर वरिष्ठ कवि-कथा-व्यंग्य-पत्रकार विष्णु नागर ने सही ही कहा था,’संजय की कविता आज की साधारण-सामान्य जिन्दगी का दस्तावेज है। एक निम्नवर्गीय शहरी का जीवन नल आने के इन्तजार में कैसे खप और बदल जाता है, यह कविता इस बात की गवाही देती है। यह कविता साधारण आदमी के जीवन से दाल के गायब हो जाने जैसी मामूली बात भी करती है। यह कविता नमक, माचिस, गुड़ की बात भी करती है। यह उस आदमी को अपराधी बना दिए जाने की बात करती है जो कभी अक्सर किनारे बैठकर नदी में कंकड़ फेंकता हुआ देखा जाता था, जो छठ के मौके पर नंगे पैर सिर पर टोकरी उठाए हाँफते हुए गंगा तट तक जाता था, जो ईंट के विकेट के आगे चौके-छक्के उड़ाता हुआ नजर आता था। यह कविता इस तरह साधारण के तमाम असाधारण विवरणों से भरी हुई है लेकिन अपनी असाधारणता को भी साधारणता के साथ धारण किए हुए, बिना शोर किए, बिना चीखे-चिल्लाये। वह असाधारण को इस तरह साधारण करती है कि जो साधारण बार-बार दिखने के कारण न दिखने जैसा लगने लगा था, वह दिखने लग जाता है लेकिन कवि उसे इस तरह नहीं दिखाता कि देखो-देखो, यह मैं हूँ जो आपको दिखा रहा हूँ बल्कि कवि तो चुपके से आपके और यथार्थ के बीच न आने की भरपूर कोशिश करता है। आप इस कविता की मार्मिकता से भी जब गुजरते हैं तो ऐसे नहीं कि आपको मार्मिकता का टूरिज्म कराया जा रहा है बल्कि इस तरह जैसे वह वहाँ पहले से मौजूद हो, बस ये है कि आपने संयोग से उसे कविता के बहाने देख लिया है। इस कविता में व्यंग्य भी जहाँ-तहाँ बिखरा पड़ा है लेकिन वह बड़बोला नहीं है, हाँ बोलता जरूर है। इसमें एक कविता है ‘हाँ बोलने के बारे में’, जो दरअसल न बोलने की जरूरत के बारे में है। यही बात इन सारी कविताओं पर भी लागू होती है। यह हाँ के विरुद्ध इनकार की कविता है।

खुद संजय का अपनी कविताई के बारे में यह वक्तव्य,’कविता मेरा सामाजिक-राजनीतिक वक्तव्य भी है। कविताओं के ज़रिए मैं उनसे संवाद करना चाहता हूँ जो जीवन को देखते हैं मेरी ही तरह और उसे बदलने के लिए बेचैन होते हैं मेरी ही तरह।’ ही बताता है कि संजय का कवि किस कदर आक्रोशित है अपने इस समय को पढते हुए....  

संजय कुंदन
जन्म : 7 दिसंबर 1969, पटना (बिहार) हाल दिल्ली,
शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य) पटना विश्वविद्यालय 
मुख्य कृतियाँ : कागज के प्रदेश में, चुप्पी का शोर, योजनाओं का शहर (कविता संग्रह),बॉस की पार्टी (कहानी संग्रह) , टूटने के बाद (उपन्यास) 
सम्मान : भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमंत स्मृति कविता सम्मान, विद्यापति पुरस्कार
संपर्क : सी-301, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012 मोबाइल: 9910257915


संजय कुंदन की कविताएं

कुछ न कहते हुए 

ऐसे समय में जब सब बोल रहे थे  
मैं कुछ नहीं कह पा रहा था 
फेसबुक पर कह रहा था कोई  
कि अभी -अभी वह नीली बनियान खरीद कर आया है 
जो एक बड़ी कंपनी की है  
कोई बता रहा था कि उसने अपनी कुतिया का नाम मॉली रखा है  
जो इतनी समझदार है जितना कोई मनुष्य भी नहीं हो सकता 
कोई अपने जूते को सबसे आरामदेह बता रहा था 
तो कोई अपने चश्मे को सबसे कीमती। 
मुझे लगता था  
मैं जब भी मुंह खोलूंगा  
मेरे भीतर से एक उदास पेड़ की पुकार आएगी  
अगर मैं कहूं कि मैं दम तोड़ चुके  
एक पेड़ को इतिहास को खंगालना चाहता हूं  
तो दुनियादारों के लिए इसका कोई मतलब नहीं होगा 
अगर मैं कहूं कि एक दोस्त को समझना  
किसी उफनती धारा को पार करना है 
तो सूचना के संजाल में हर क्षण विस्तृत हो रहे  
मित्र संप्रदाय को यह बुरा लगेगा  
अगर कहूं कि मुझे नहीं मालूम कि सच क्या है  
तो यह आज के दौर में  
जब सब कुछ तय कर लिया गया है 
प्रलाप ही माना जाएगा  
अब तो बहुत आसान था फैसला देना  
बस माउस क्लिक करके या कुछ शब्द टाइप करके  
खड़ा हुआ जा सकता था किसी विचार के साथ  
किसी को स्वीकृत किया जा सकता था  
और किसी को खारिज 
किसी शोहदे को घोषित किया जा सकता था मसीहा  
किसी सौदागर को बताया जा सकता था  
सबसे बड़ा परिवर्तनकामी 
इतनी आसानियों के बीच  
चीजों को उलझाने वाली  
मेरी बातों को भला कोई क्यों सुनेगा चाहेगा! 
*****

आग 

अपना सगा तो उसने  
अपने पिता को भी नहीं समझा था 
जो उसे छुपाना चाहते थे  
अपनी एक भूल की तरह  
उसके सगे भाई भी उसे सगे नहीं लगे  
जो उसे चुनौती की तरह देखते थे  
और प्रतियोगिता करते थे उसकी छाया से भी  
एक मां थी उसकी सगी  
जो अपनी चुप्पी से उसके पक्ष में खड़ी रहती थी 
पर असल में उसकी सगी थी वह आग  
जो उसके साथ ही पल-बढ़ रही थी  
जिससे खेलना उसे अच्छा लगता था  
कभी-कभी अचानक उसके रक्त में उबाल आ जाता था  
और आंखों में उठने लगती थीं लपटें  
यह बात मोहल्ले की फुसफुसाहटों में  
बड़े अश्लील ढंग से कही जाती थी  
उसके भीतर आग है आग!  
***** 

उनके बारे में 

उनके बारे में लिखना बहुत आसान है 
जिन्हें हम बहुत कम जानते हैं 
जैसे समुद्र के बारे में  
जैसे पहाड़ के बारे में  
बार-बार आता रहता है कविता में  
कोई समुद्र और पहाड़  
जिसे कवि कभी देख आया होता है  
एक-दो बार यात्रा में  
सबसे कठिन है उसके बारे में लिखना  
जिसे हम बहुत ज्यादा जानते हैं 
वह इतना करीब होता है कि कई बार 
महसूस तक नहीं होता उसका होना  
वह इतना दिखता है कि लगता है इसे देखना क्या है 
जिनकी आंखें सैकड़ों प्रकाश वर्ष दूर एक नक्षत्र में  
जाने क्या-क्या ढूंढ लेती हैं 
वे नहीं पढ़ पाते   
अपने बगल में लेटी एक औरत की  
आंखों की नमी।  
***** 

उस मृत लड़की का बयान, जिसे उसके पिता ने गोली मार दी 
मैं अपने को भाग्यशाली मानती थी  
कि मुझे गर्भ में नहीं मारा गया 
मुझे लगा था कि आप सब मुझे बढ़ते देखना चाहते हो 
इसलिए मैं बढ़ना चाहती थी खूब तेजी के साथ  
किसी लता की तरह 
नदी की एक तेज धारा की तरह  
मैं चट्टानों को काटते हुए आगे बढ़ने को बेताब थी 
मैंने सुना था और देखा भी था एक घर का ङ्क्षपजरे में बदलना  
उसमें बंद डर-डर कर मुंह खोलती थी लड़कियां 
पर मैं अपने को भाग्यशाली मानती थी कि 
जी भर निहार सकती थी आकाश 
बुन सकती थी इच्छाएं 
  
मैंने चाहा कि रेडियो सुनूं और आपने सुनने दिया 
मैं पढ़ना चाहती थी और आपने पढ़ने दिया 
मैं जीन्स पहनना चाहती थी और आपने पहनने दिया 
जब मैं सपनों के आकाश में पतंग की तरह लहराने लगी  
तब मुझे पता चला कि आपने कई अदृश्य डोरों से मुझे बांध रखा था 
लेकिन तब तक आंधी बनकर उतर चुका था मेरे भीतर प्यार 
मैंने तोड़ दिए धागे  
आपको सब कुछ मंजूर था 
मेरा हंसना बोलना, इत्र में नहाना   
बस मेरा प्रेम करना मंजूर न था आपको 
  
जब आपने मेरे ऊपर बंदूक तानी तो  
आपके हाथ थोड़ी देर के लिए कांपे थे  
पर आपकी बची-खुची मर्दानगी ने आपको संभाल लिया था 
आपने पूरी कोशिश की कि आप पौरुष  
और आत्मविश्वास से भरपूर दिखें  
जब आप पुलिस के सामने कह रहे थे  
कि आपको अपने किए पर पछतावा नहीं है  
और आपने यह हत्या अपने सम्मान की रक्षा के लिए की है 
हालांकि आपकी नजरें बार-बार नीची हो जा रही थीं  
और गला भी भर्रा जा रहा था ठीक एक हारे हुए योद्धा की तरह। 
  
तब मुझे पहली बार पता चला कि एक बर्बर आदमी  
कितना डरपोक होता है  
अब जबकि मैं नहीं हूं आपकी दुनिया में  
आप बच-बचकर चलते हो मेरे पैरों के निशान से  
हवा में मेरी हंसी की अनुगूंज से 
अफसोस कि आपकी बंदूक उन्हें नहीं मिटा सकती। 
***** 

समझदार लड़की 

उसकी मां उसे जीवन भर नादान देखना चाहती थी 
पर शहर ने उसे समझदार बना दिया 
एक मायावी शहर ने 
सबसे पहले उसने अपनी हंसी की लहरों को बांधा 
उसकी हंसी ही उसकी दुश्मन बन सकती थी 
यह उसने जान लिया था 
उसने सीख लिया कि कहां कितना वजन रखना है अपनी हंसी का 
थोड़ी भी अतिरिक्त हंसी उसे गिरा सकती थी किसी गहरी खाई में 
वह पहचानने लगी थी भाषा के भीतर की खाइयों को 
यहां सहानुभूति का अर्थ कारोबार भी था 
और दोस्ती का अर्थ आखेट हो सकता था 
इसलिए वह सबसे ज्यादा सावधान रहती थी 
मोरपंख जैसे शब्दों से 
गुलदस्ते जैसे शब्दों से 
उसे पता चल गया था कि 
विनम्रता कितना खतरनाक फंदा बुन सकती थी 
वह बहुरुपियों को उन्हीं के हथियार से 
चुनौती दे सकती थी पर उसे उन हथियारों से कोई लगाव न था 
उसे किसी को हराने और जीतने का शौक न था 
वह तो किसी तरह बच-बचाकर निकल जाना चाहती थी 
अपने सपने की ओर। 
*****

६ 
सुखी लोग 

सुखी लोगों ने तय किया था कि अब केवल सुख पर बात होगी 
सुख के नाना रूपों-प्रकारों पर बात करना 
एक फैशन बन गया था यहां 
सरकार भी हमेशा सुख की ही बात करती थी 
उसका कहना था कि वह सबको सुखी तो बना ही चुकी है 
अब और सुखी बनाना चाहती है 
उसके प्रवक्ता रोज सुख के नए आंकड़े प्रस्तुत करते थे 


सरकार के हर फैसले को सुख कायम करने की दिशा में 
उठाया गया कदम बताया जाता था 
लाठी और गोली चलाने का निर्णय भी इसमें शामिल था 
इस सब से दुख को बड़ा मजा आ रहा था 
वह पहले से भी ज्यादा उत्पाती हो गया था 
वह अट्टहास करता और कई बार नंगे नाचता 
पहले की ही तरह वह कमजोर लोगों को ज्यादा निशाना बनाता 
वह खेतों का पानी पी जाता, फसलें  चट कर जाता 
छीन लेता किसी की छत और किसी की छेनी-हथौड़ी 
यह सब कुछ खुलेआम हो रहा था 
पर अखबार और न्यूज चैनलों में केवल मुस्कराता चेहरा दिखाई पड़ता था 
हर समय कोई न कोई उत्सव चल रहा होता मनोरंजन चैनलों पर 
वैसे सुखी लोगों को भी दुख बख्शता नहीं था 
कई बार अचानक किसी के सामने आकर वह उस पर थूक देता था 
सुखी व्यक्ति इसे अनदेखा करता 
फिर चुपके से रुमाल निकालकर थूक पोंछता 
और चल देता किसी जलसे के लिए। 
*****

जादू 

कौन सी चीज कब जादू कर दे 
कहना मुश्किल है 
किसी दिन चले गए चौलाई साग लाने 
पांच किलोमीटर दूर पैदल, प्रचंड धूप में 
फिर स्वाद-स्वादकर खाया और दूसरों को भी बताया 
कई दिनों तक चर्चा की 
कोई कह सकता है एक मामूली चीज के लिए 
ऐसा पागलपन ...क्या मतलब है! 
अब जादू तो जादू होता है 
वह बड़ा या छोटा नहीं होता 
एक दिन आया भीख मांगता कोई 
पता नहीं ऐसा क्या गाया कि भर्रा गया गला 
मन न जाने कहां चला गया कितने बरस पीछे 
कि लौटना मुश्किल हो गया 
भटकते रहे एक पुराने शहर में 
ताकते रहे खिड़कियों पर 
न जाने क्या खोजते रहे। 
*****

अधूरी प्रेमकथा  

अचानक जमा होने लगते हैं रंगीन बादल 
दिखाई पड़ते हैं कुछ प्रवासी पक्षी पंख फैलाए 
एक नया मौसम उतरता है  
जिंदगी के एक ऐसे मोड़ पर  
जब उकताहट और खीझ से लथपथ  
आदमी नाक की सीध में चल रहा होता है  
खुद को घसीटते हुए  
एक अधूरी प्रेमकथा में  
फिर से लौटती है रोशनी  
कुछ पुराने पन्ने लहलहा उठते हैं   
फिर वहीं से सब कुछ शुरू होता है  
जहां कुछ कहते-कहते कांप गए थे होंठ  
और बढ़ते-बढ़ते रह गए थे हाथ  
हवा अपने पैरों में बांधने ही वाली थी घुंघरू 
जमीन को छूने ही वाली थीं कुछ बूंदें  
खत्म कुछ भी नहीं होता 
स्थगित भर होता है  

न जाने कितनी बार जीवन लौटता है  
इसी तरह अपनी कौंध के साथ।  
*****

संजय कुंदन

Sunday, 15 September 2013 5 comments

ज़िन्दगी की एक किताब है ,जिसके पन्ने हर जगह मुड़े हुए हैं

 दीपक अरोड़ा का असमय निधन, युवा कविता की अपूरणीय क्षति......... 
दीपक अरोड़ा
ज़िन्दगी की एक किताब है ,जिसके पन्ने हर जगह मुड़े हुए हैं | जहाँ से खोल लो ...नयी जगह ,नया दिन ,नया सफ़र | जिंदगी के साल ,ख़ाली जमीन को मकानों ,दफ्तरों ,फौज की छावनियों में तब्दील करते गुज़रे | ख़ाली जगह को ईमारत बना भरता हूँ ,आबाद देखने से पहले ,किसी खुली ,ख़ाली जगह नयी ईमारत को तामीर करने निकल पड़ता हूँ |लिहाज़ा ज़िन्दगी खानाबदोशी में कटी | कविता में आना कुछ यूँ रहा,जैसे बरसात में चप्पल पहन निकले किसी के कपडे ,छींटो से भर जाए ..और उसे पता भी ना चले |

दीपक अरोड़ा की कुछ कविताएं



एक विंडचाइम,
बहुत सालों से ,
घर के दरवाज़े पर
लटकी है,मेरे कुल कद से ,
एक सेंटीमीटर ऊँची,
बिला नागा बजती है ,
जब भी मैं गुज़रता हूँ ,
इस दरवाज़े से हो कर ,और
अक्सर तो तब भी ,
जब मैं घर नहीं होता ,
न आया हुआ ,ना जाता हुआ |
दरअसल ,यह सिर्फ गुसलखाने की ,
टूटीयों की टिप -टिप ही ,
नहीं होती ,जो रात भर टपकती है ,
नीचे पड़ी प्लास्टिक की ,
बाल्टियों में ,और आप ,
आधी -आधी रात को ,
उठ बैठते हैं ,अक्सर तो
पूरी रात ही नहीं सोते |
ज्यादा आसान लगता है आपको ,
खुद को इन्सोम्निक बता कर ,
बड़े बाज़ार वाले केमिस्ट से ,
हफ्ते में दो बार नींद की ,
गोलियां मंगवाना ,बजाय
एक ही बार प्लम्बर बुला कर ,
सारी टूटीयां ठीक करवा लेने से |

२.

दरअसल आपके
और सिर्फ आपके सिवा ,
पुरे घर में ,कोई भी नहीं जानता ,कि
टूटीयां जब टपकती हैं,
बूंदें बन कर,स्मृतियों की बाल्टियों में,
तब नीमबंद आपकी पलकों से ,
एक समय भी गुज़रता है ,
सुरमचू की तरह ,और
याद आते हैं वह दिन,
जब आप नुक्कड़ों पर खड़े,
किसी परी चेहरा दोशीजा के ,
वहां से गुजरने का इंतज़ार करते थे,
जिसके एक नज़र आपको ,
देख लेने भर से ,दिन भर
प्रेम की बूंदें टपकती रहतीं थीं ,
दिल के मटके में |

३.

सच कहूं ,तो
आप इमानदार नहीं हैं ,
अपनी नींद के साथ भी ,
और जीना चाहते हैं ,
विंडचाइम और कालबेल ,
की घंटियों के बीच ही कहीं ,
अपने बचे हुए समय को ,
गहरी काली रातों में ,
सायं-सायं करती तेज़ हवा चलती है ,
और हवा से हिलती ,
विंडचाइम की पाइपें,
एक दुसरे से टकराती हैं ,
सर्द रातों में भी आप ,
दरवाज़ा खोल कर देखते हैं ,
जहाँ किसी ने ,
अब होना ही नहीं है |
*****

जागता....... 

मैं बहुत दिन से सोया नहीं ,कि
आँख का भार से झपक जाना होता सोना ,तो
मैं जागा ही नहीं कभी .

दरअसल जागने और सोने के अंतराल को,
कलाई घडी से नापते निकल गयी,
सो सकने की वह उम्र,
जब समय से उगे सूरज की पहली आँख छूती किरण,
गुस्ताख प्राकृति की छेड़ लगती थी,
और सुरमे सी आँख में फिरती रौशनी,
तालाब की भैंस को बाहर निकालते,
उचारी गयी जोर की टिचकारी,

अब दिन भर की उदासियों को,
अपनी उँगलियों से छू,
जब जा पाता हूँ सोने ,
मेरी आँख में तैरती रहती हैं ,
बिना पलक की मछलियां,
जिन्हें मूंद्नी नहीं पड़ती पलकें सोने को ,कि
पलकों का मूंदना होता सोना,तो
हर सुबह अंगडाई तोड़ उठती दुनिया .
सच जाग ही जाती .

यूँ भी कहाँ सोता है सच में कोई,
जब बैठा होता है ,
एक दूसरे को थपक सुलाने का ख्याल,
 पलकों के भीतर .
दीपक अरोड़ा

(साभार- प्रथम पुरुष)


Saturday, 8 June 2013 5 comments

’जो टूट गया, मैं तो उसके लिए लिखता हूं कविता...’ मायामृग

मायामृग
"गुनाह भीतर होता है बाहर से पहले.....होने से पहले जुटा लेता है बेगुनाही के सबूत...। गुनाह जो हो ना सका, सोचा गया, हो ही गया....। सबूत गुनाह के भी बहुत थेबेगुनाही के भी .. बेगुनाही के सबूत हमेशा कच्‍चे होते हैं.कुछ छिपा  लिए...कुछ दिखा दिए...... बुरा वक्‍त सजा का नहीं, बुरा है फैसले के इंतजार का वक्‍त....अपने गुनाह से ड रता रहा...तुम्‍हारी बेगुनाही से भी....तुम बेगुनाह थे,चीख तो सकते थे....मैं गुनाहगार....चुप न रहता तो क्‍या करता......तकदीरों और तदबीरों का खेल खत्‍म होने के बाद, तुम्‍हें हो तो हो...मुझे किसी फैसले का इंतजार नहीं...."

मायामृग

जन्म:  26 अगस्त 1965( फ़ाजिल्का- पंजाब)
शिक्षा: एम. ए., बी.एड., एम.फ़िल.(हिन्दी)
प्रकाशन: शब्द बोलते हैं- 1988, कि जीवन ठहर जाए-1999
संप्रति: स्वतंत्र लेखन व प्रकाशन व्यवसाय उनके  द्वारा संचालित बोधि प्रकाशन ने सस्ते मूल्य पर अच्छी और सुरुचिपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित पूर्व प्रकाशकों द्वारा फ़ैलायी गयी इस धारणा को गलत साबित कर दिया कि किताबें बिकती नहीं हैं। बोधि प्रकाशन हर अपने स्थापना वर्ष से ही स्तरीय पुस्तकें छाप ही नहीं रहा बल्कि बिक्री के नए आयाम भी स्थापित कर रहा है। 
संपर्क: बोधि प्रकाशन, एफ़-77 करतारपुरा इंड.एरिया, बाइस गोदाम, जयपुर-302006 मो. ०9829018087



मायामृग की कविताएं



(एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी सीरीज की कुछ गद्य कविताएं)



तुम्‍हें अपनी बेचैनियां कहनी होती हैं, मुझे अपना सुकून तलाशना होता है....प्रेम अगर बेचैनी से परे कुछ नहीं तो प्रेम की तलाश पूरी होने तक यह सफर बीच में छूट जाना तय है....हर कदम जो इस राह पर पड़ा, उसके निशान सिर्फ देखने के लिए नहीं....पीछे आते को राह दिखाने के लिए भी हैं....। चलो...यह सफर यूं ही सही....तुम कहते रहो, मैं चुप रहूंगा....
(एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी...पन्‍ना नंबर ग्‍यारह....एक और एक दो कि......एक और एक ग्‍यारह....सारी कहावतें चुप खड़ी हैं.....)



सम्‍बन्‍धों से तय होगी जरुरतें कि जरुरतों से तय होंगे सम्‍बन्‍ध....जो बदलते गए, वे सम्‍बन्‍ध रहे होंगे....जो दिखते रहे वे जरुरतों में शामिल थे....बदलना भी तय था, दिखना भी....सम्‍बन्‍ध भी सच थे...जरुरतें भी...चुप रहकर सम्‍बन्‍ध निभाए....बोल बोलकर जरुरतें दर्शाई....इस ढेर सारे सन्‍देह के नीचे सम्‍बन्‍ध दबे हैं कि जरुरतें, चलो खोजते हैं....
(एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी, सत्रहवां पन्‍ना ...कुछ तो है यहां, मिले भले ना मिले....)



पकड़ के साथ ही तय हो जाता है छूटना.....कि जैसे छूट गए थे आखिरी कुछ शब्‍द बात पूरी होने से पहले...जिन्‍हें मुड़ने से पहले सुन नहीं पाए तुम.......सफर में छूट जाता है पीछे फालतू सामान...खाली बोतलें पानी की...कि याद नहीं रखना होता ...छूटा हुआ कुछ भी....छूट ही गया था वह गमला कसकर थामे हुए हाथों से भी...कि जिसमें पहली बार उगा था लाल फूल....और वह सफेद मनकों की माला...जिसके मनके बिखर गए हाथ से छूटते ही....। फकीर की झोली में रखे सफेद पत्‍थर उसी माला के हैं...जिनसे तोड़ता है वह भीतर का महामौन...और छोड़ता चलता है चुप्पियां पीछे राह भर.....
(एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी चालीसवां पन्‍ना.....पता नहीं क्‍या है वह जो तुम्‍हारे छोड़कर चले जाने बाद भी नहीं छूटा ........)



गुनाह भीतर होता है बाहर से पहले.....होने से पहले जुटा लेता है बेगुनाही के सबूत...। गुनाह जो हो ना सका, सोचा गया, हो ही गया....। सबूत गुनाह के भी बहुत थे, बेगुनाही के भी........बेगुनाही के सबूत हमेशा कच्‍चे होते हैं......कुछ छिपा लिए...कुछ दिखा दिए....।.... बुरा वक्‍त सजा का नहीं, बुरा है फैसले के इंतजार का वक्‍त....अपने गुनाह से डरता रहा...तुम्‍हारी बेगुनाही से भी....तुम बेगुनाह थे,चीख तो सकते थे....मैं गुनाहगार....चुप न रहता तो क्‍या करता......तकदीरों और तदबीरों का खेल खत्‍म होने के बाद, तुम्‍हें हो तो हो...मुझे किसी फैसले का इंतजार नहीं....
(तुम्‍हारी अदालत में कटघरे में हूं....मुन्सिफ ना होते तो होते तुम भी यहीं...... एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी....80 वां पन्‍ना)



याद है...वो छोटी सी चिडि़या...जिसे बहुत बार छूना चाहा तुमने....हर बार उंगुलियों की हरकत भर से डर गई जो....जिसका नाम रखने को लेकर बहुत देर तक लड़े थे हम...आखिर वही तय हुआ जो तुमने चुना....तुमने रख दिया...मुझे वही नाम बहुत अच्‍छा लगा....चितकबरे पंखों की खूबसूरती पर हमेशा कुर्बान रहे तुम....पता है पंखों की खूबसूरती उनके रंग में नहीं....उनकी उड़ान में थी...आमसान घुट जाने के बाद समझ आया मुझे.....बहुत दिन बाद तक आती रही रोज...वहीं उसी जगह बैठती ....मैंने उस दिन के बाद उसे दाना चुगते नहीं देखा....जीती कैसे होगी ि‍फर भला....पर चिडि़या के सामने कहां हैं इतनी विवशताएं....इतनी अनिवार्यताएं जीने की...मन की मौजी..मन हुआ तो चुगा...न हुआ तो न हुआ....उसे कहां सफाई देनी होती है अपने हर काम की....। सुनो, .....आज सुबह वहीं उसी जगह उसके पंख नुचे हुए मिले....उनमें चितकबरा रंग अब भी था....बस उड़ान नहीं थी....मुझे सुन्‍दर नहीं लगे पंख....तुम्‍हें क्‍या अब भी अच्‍छे लगते हैं चितकबरे पंख......
(उस चिडि़या में किसी और के हों न हों....उसके अपने प्राण जरुर बसते थे.......एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी...91 वां पन्‍ना ..)


(दीवाने के खत सीरीज की दो गद्य कविताएं)

दीवाने के खत : चौथा खत
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मेरे प्रिय

आंख आंसुओं से नम नहीं होती, सपनों से होती है। यह कभी नहीं जान पाता, जो उस दिन तुम्‍हारी आंखों में ना झांका होता। आंखें देखीं, आंखों में ठहरा पनियाया सपना देखा। भीगे हुए सपने सूखे जीवन को सींचते हुए जाने किस हरियाये पल के सपने देखते हैं। पूछना तो है पर किससे पूछूं कि सपने देखना पानी पर पानी लिखने जैसा क्‍यूं है? 
पानी तुम्‍हारी आंख में था, पानी कांच के गिलास में भी था जिसे आधा छोड़ दिया तुमने। मेरी प्‍यास उस अधूरेपन से पूरी भर गई। तुमने नदी को उस छोर से छुआ होगा जरुर, वरना मुझ तक बहते आते कैसे बचा लेती इतना पानी। पानी कि जिस पर लिखा है तुम्‍हारा खत। हां, नम होकर पढ़ा हर बार मैने पानी पर लिखा पानी....

तुम्‍हारा ही
मैं

दीवाने के खत : चौदहवां खत
---------------------------------
मेरे प्रिय

किस बात का अफसोस है तुम्‍हें। नहीं कुछ भी नहीं है जिसे भूल कहा जाए। पता नहीं क्‍यो लगता है तुम्‍हें कि जो हुआ उसे बदला जाना था। उसे ऐसा नहीं होकर वैसा होना था। तुम्‍हारे बीते हुए दिन अफसोस के नहीं हैं, पछतावा और अफसेास फैसले में पहले से छिपे रहते हैं बस वक्‍त आने पर दिखने लगते हैं। इन चूकों के साथ ही जीना होता है, पुरानी भूलें नई भूल करने की जमीन तैयार करती हैं। नई भूल करें, पुरानी भूलों पर अफसोस नहीं रहेगा...गलतियां भी करें तो हर बार नई हों, बस इतना सा ही तो जीवन है....। भूलों को जताना दुनिया है, भूलों को भूल जाना प्रेम। जो प्रेम अतीत तो स्‍वीकार न कर सके वह भविष्‍य को स्‍वीकार करेगा, संदेह है। जो कल तुम्‍हारा था, वह मेरा हुआ, जो आज तुम्‍हारा है, वह मेरा हुआ, जो भविष्‍य मेरा है, लो यह तुम्‍हारा हुआ....

तुम्‍हारा ही
मैं

(गलत व्याकरण सीरीज की दो कविताएं)


मुहावरे 
पानी पानी में मिला
गागरें गागरों से
टकराती रहीं
सागर सरक कर सागर से जा मिला
पानी- पानी कौन हुआ...
विमर्शों में
कविता में सच ढूंढ़ने से बेहतर
और आसान था
सागर में गिरी सुई ढूंढ लेना...।


युग्म

तुम सही थे...
गलत मैं भी नहीं...
बस
इतनी सी बात थी...कि
हम मिल न सके!


कुछ और चुनी हुयी कविताएं


रंग- सुगंध

मैंने तुम्हें जो फ़ूल दिए
उनमें गंध नहीं थी...
मुझे पता है
तुम सुगंध भर दोगी इनमें...

तुमनें मुझे जो फ़ूल दिए
बेरंग हैं वे
तुम्हें यकीन रहा होगा
कि रंग भर ही दूंगा मैं...

तुम्हारा- मेरा प्रेम
दरअसल रंग और सुगंध की तलाश है..।
(तुम्हें पहले मिले तो तुम मुझे बताना, मुझे मिले तो मैं सबको बताऊंगा...)


तुम्हारी किताब में मेरा हिसाब

तुम्हारा हिसाब
मेरी किताब में दर्ज़ नहीं है

तुम्हारे खाते में जो ’दिया’ है
उसे मेरे ’लिया’ में चढा़ दो

मेरी कमज़ोरियों को
तुम्हारे उलाहनों से घटाकर
उन पलों में जोड़ दो
जब तुमने कहा था
हमारा मिलना बिना शर्त है...।

तलपट कुछ भी कहे
अपने लिखे में काट- छांट करना
तुम्हारा अधिकार है...।

मैंने लिखा नहीं,
इसलिए काटा नहीं...।

तुम्हारी किताब में मेरा हिसाब है
इसके बाद कोई हिसाब- किताब नहीं...।


बिना धार के चाकू से

पहले खुद को काटा
वह हर धागा काटा जो बांधता था
वह हर रास्ता काटा जो तुम तक पहुंचता था
बिना धार के चाकू से वह सब काटा
जो कट सकता था....

तुम्हारा एतराज अपनी जगह सही है
आखिर इतना कटा कटा सा क्यूं रहता हूं मैं आजकल...
सोचा, चाहा भी कहना पर... बहुत डर लगा अपना डर लिखते हुए...
(अपने डर सहेज कर जीता हूं... तुम कहते हो डर- डर के जीता हूं...)


हामी

उसने कहा, स्त्री! तुम्हारी आंखों में मदिरा है...
तुम मुस्करा दीं।

उसने कहा, स्त्री! तुम्हारे चलने में नागिन का बोध होता है...
तुम्हें नाज़ हुआ खुद पर...।

अब वह कहता है-
तुम एक नशीली आदत और ज़हरीली नागिन के सिवा कुछ भी नहीं...।

(ओह! इसका अर्थ यह भी होता है)
तुमने पहले क्या सोचा था स्त्री...
उसकी तारीफ़ पर हामी भरते हुए!


एक कहानी थी

एक कहानी थी... दरअसल एक ही कहानी थी।

कुल जमा दो हिस्सों में जिया इसे
पहला हिस्सा फ़ैसले लेने में बिताया...
दूसरा हिस्सा फ़ैसलों को बदलने में...

यह पता नहीं किसकी कहानी है... शायद आपकी... शायद मेरी...


आग

आग को घेरे बैठे हैं लोग
उन्हें लगता है आग ताप रहे हैं
दरअसल उन्हें ठीक से पता नहीं
आग तपा रही है उन्हें
मुझे तो यह भी पता है कि
आग को घेरा नहीं जा सकता
जब भी घेरेगी
आग ही घेरेगी उन्हें...।
(यूं कुछ भी सोचकर खुश होने का नैतिक अधिकार अब भी सुरक्षित है... तमाम वर्जनाओं के बाद भी...)


जो टूट गया

सधे हाथों से
थाप थाप कर देता है आकार
गढ़ता है घड़ा
गढ़ता है तो पकाता है
पकाता है तो सजाता है
सज जाता है जो.. वह काम आता है...

हर थाप के साथ
खतरा उठाते हुए
थपते हुए
गढ़ते हुए
रचते हुए
पकाते हुए
टूट जाता है जो... टूट जाता है...

जो काम आया... उसकी कहानी आप जानते हैं
जो टूट गया, मैं तो उसके लिए लिखता हूं कविता...।

- मायामृग

Tuesday, 28 May 2013 5 comments

औरतें सपने नहीं देखा करतीं व अन्य कविताएं - देवयानी भारद्वाज

"मेरे लिए यह दुनिया 
घर की बाखर है 
जिसमें लगाती हूं दौड़ निःसंकोच 
खेलती हूं, हंसती हूं, गाती हूं 
आसमान को छूने की जिद ठाने हूं"

मित्रो! उदाहरण में आज हमारे साथ हैं हमारे समय की कविता में एक महत्त्वपूर्ण और सशक्त युवा हस्ताक्षर देवयानी भारद्वाज। अपने अकूत विश्वास और हौंसलों से भरी "गोरैया सा चहकना चाहती हूँ मैं चाहती हूँ तितली की तरह उड़ना, और सारा रस पी लेना चाहती हूँ जीवन का" व "आसमान को छूने की जिद ठाने"  युवा कवयित्री देवयानी भारद्वाज। "खुद के बनाए और खुद पर हावी होते साम्राज्य को खरोंचती ही रहती हूं अपनी छुटकी अंगुली से" का माद्दा रखनेवाली कवयित्री देवयानी की कविताएं अपने आसपास के परिवेश और विसंगतियों से उपजी हमारे रोजर्मरा की ज़िंदगी की जद्दोज़हद कविताएं हैं। इन कविताओं की बेबाकी, गहराई और धार सचमुच मार करनेवाली है।


देवयानी भारद्वाज 
जन्‍म 13 दिसंबर 1972 , शिक्षा एम ए हिन्‍दी साहित्‍य (राजस्‍थान विश्‍व विद्यालय) व़र्ष 1995.

वर्ष 1994 से 2004 तक पत्रकारिता के दौरान नियमित फिल्‍म समीक्षा तथा फीचर लेखन। वर्ष 2001 में प्रेम भाटिया फैलोशिप के तहत 'विकास की असमानता और विस्‍थापित होते लोग' विषय पर अध्‍ययन (अब तक अप्रकाशित)। भोजन के अधिकार आंदोलन के साथ एक नियमित बुलेटिन 'हक' का संपादन। व़र्तमान में शिक्षा में सक्रिय स्‍वयं सेवी संस्‍था 'दिगंतर' के साथ असोसिएट फैलो के रूप में कार्यरत। 
कथन, शिक्षा विमर्श, जनसत्ता, आउटलुक आदि पत्रिकाओं तथा प्रतिलिपि, समालोचन, असुविधा, आपका साथ साथ फूलों का, परिकथा ब्‍लोगोत्‍सव आदि ब्‍लोग्‍स पर कविताएं प्रकाशित। अखबारों के लिए छिट-पुट लेखन कार्य जारी। अंग्रेजी एवं हिन्‍दी में शिक्षा से संबंधित अनेक अनुवाद प्रकाशित।


औरतें सपने नहीं देखा करतीं व अन्य कविताएं - देवयानी भारद्वाज




एक दिन

कपड़े पछीटते-पछीटते एक दिन 
मेरे हाथ दूर जा गिरे होंगे 
मेरी देह से 

चूमते-चूमते छिटक कर 
अलग हो गए होंगे 
होंठ मेरे चेहरे से 

तुम्हारे दांतों बीच दबा स्तन 
नहीं कराएगा मेरे ही सीने पर होने का अहसास 

वह लड़की जो मुझमें थी 
सहम कर दूर खड़ी होगी 
तड़प रहा होगा कोई भ्रूण मुझसे हो कर जन्मने को 

क्रूर 
बेहद क्रूर होगी 
मेरे आस-पास की शब्दावली 
निश्चेष्ट पड़े होंगे मेरे अहसास 

कठिन 
उस बेहद कठिन समय में 
रचना चाहूंगी जब एक बेहतर कविता 
मेरी कलम टूट कर गिर गई होगी 
लुढ़क गई होगी मेरी गर्दन एक ओर 
तुम अपलक देख रहे होगे 
उस दृश्य को


तुम 

तुमसे ज्यादा कुछ नहीं 
तुमसे कम पर कोई समझौता नहीं 
तुम्हारे सिवा कोई नहीं है 
मंज़ूर मुझे


मुश्किल न था कुछ भी 

आसमान छूना चाहा होता मैंने 
तो मुश्किल न थी 
आसमान छूना 
चाहा नहीं था मैंने 

दुनिया को बदलने का सोचा होता 
तो कूद सकती थी 
एक अंधी लड़ाई में 
दुनिया को बदलने का 
सोचा नहीं था मैंने

सत्ता ने कभी लुभाया होता मुझे 
अपने आस-पास 
कोई तो साम्राज्य गढ़ ही लेती मैं 
सत्ता ने कभी 
लुभाया नहीं मुझे 

आसमान को जहां था 
वहीं देखना चाहा 
दुनिया को समझने की कोशिश में 
बिता आई हूं चौथाई सदी 
खुद के बनाए 
और खुद पर हावी होते साम्राज्य को 
खरोंचती ही रहती हूं 
अपनी छुटकी अंगुली से 

दरअसल 
सपनों को लेकर 
कोई महत्वाकांक्षा 
पाली नहीं थी मैंने 

अपनी सतह पर रहते 
उससे उठने की कोशिश करते 
सपनों को देखना और जीना 
लुभाता रहा मुझे


इच्छा

मेरी इच्छा के गर्भ में पल रही संतान 
मेरे सपनों में अक्सर ठहरती है तू 
मैं जुटा नहीं पाती इतना हरा 
अपने भीतर और बाहर 
जो लहलहा उठे तेरे आने से 
तेरे आने की इच्छा करने से 
रोकती हूं अपने को


हीनता 

कह जो दिया मैंने 
क्या सोचेंगे सब लोग 
छिछोरी बात, हल्के शब्द 
जाहिल छोरी


नदी - एक 

बहने को आतुर है 
एक नदी 
वेगमयी 
बांध के उस ओर 

बांध के द्वार खुलें 
तो देखें 
नदी का पारावार 


नदी - दो 

नदी बहना जानती है 
जानती है मिल जाना 
समुद्र के विस्तार में 
अपने समूचे वेग से 
भिगोती चलती है 
आस-पास की धरती 

वह तुम ही थे 
जिसने बनाए बांध 
रोक दिए नदी के पांव 
आज प्यासे बैठे हो 
नदी आए 
तो पानी लाए


जन्म की कथा

मां बताती थी 
आसमान से घर की बाखर में गिरी थी मैं 
ऐन मां की आंखों के सामने 
और उन्होंने गोद में उठा लिया था मुझे 

जन्म की कथा तो मां ही जानती हैं 
कितने ही आसमानों से गिरी हूं जाने कितनी बार 
मां ने हर बार भर लिया बांहों में 
दिया दुलार 
मेरे लिए यह दुनिया 
घर की बाखर है 
जिसमें लगाती हूं दौड़ निःसंकोच 
खेलती हूं, हंसती हूं, गाती हूं 
आसमान को छूने की जिद ठाने हूं 
पिता सीढ़ी ले आते हैं 
मां साया बन साथ रहती है


रोटी की गंध

पेट की भूख का रिश्ता रोटी से था 
यूं रोटी का और मेरा एक रिश्ता था 
जो बचपन से चला आता था 

रोटी की गंध में 
मां की गंध थी 
रोटी के स्वाद में 
बचपन की तकरारों का स्वाद 
इसी तरह आपस में घुले-मिले 
रोटी से मां, भाई और बहन के रिश्तों का 
मेरा अभ्यास था 

पिता 
वहां एक परोक्ष सत्ता थे 
जिनसे नहीं था सीधा किसी गंध और स्वाद का रिश्ता 

बचपन के उन दिनों 
रोटी बेलने में रचना का सुख था 
तब आड़ी-तिरछी 
नक्शों से भी अनगढ़ 
रोटी बनने की एक लय थी 
जो अभ्यास में ढलती गई 

अब
रोटी की गंध में 
मेरे हाथों की गंध थी 
रोटी के स्वाद में 
रचना और प्रक्रिया पर बहसों का स्वाद 

रोटी बेलना अब रचना का सुख नहीं 
बचपन का अभ्यास था


औरतें सपने नहीं देखा करतीं

हर सफल आदमी के पीछे 
होती है एक औरत ...

नितांत अकेली और असफल 

जिसकी इच्छाओं के जंग लगे संदूक में 
बंद पड़े हैं कई अधूरे सपने 
गर्द में सने 
सुगबुगाते हैं कभी अकेलेपन में उपजी इच्छाओं में 
और होते जाते हैं जमा 
उसी संदूक की अंधेरी तहों में 
जिसका ताला बरसों से खोला नहीं गया है 

जमी है जिस पर धूल 
जंग खा रहे हैं जिसके कुंदे 
चाबी जिसकी मिली नहीं कभी 
जीवन नदी के वेग में 
कब उसके हाथ से छूटी और बह गई 
अब तो यह भी याद नहीं 

उसका नहीं होता कोई एकांत 
जानते हैं सब 
औरतें सपने नहीं देखा करतीं


उसका जाना 

वह एक जंगल में गया 
जो बाहर से बीहड़ था 
अंदर से बेहद सुकुमार 

वहां जगमगाती रोशनियां थीं, 
रंग थे, फूलों वाली झाड़ियां थीं, 
सम्मोहक तंद्रिल संगीत था 

वह गया 
कि उतरता चला गया 
उसकी स्मृतियों में पीछे छूट चुके हम थे 
जिनके बाल बिखरे थे 
जिनके पैरों पर धूल जमी थी 
जो कई-कई दिनों में नहाते थे 

पलट कर उसने देखा नहीं 
हम देखते रहे उसका जाना 
एक बीहड़ में 
खौफनाक जानवरों के बीच 

हमें देख हिलाते हाथों की ऊर्जा उसकी नहीं थी


दबंग

वे जो अपनी दबंगता के लिए 
प्रभावित करते रहे थे मुझे 
दरअसल जीवन में सफल 
न हो पाने पर 
अपनी खीझ में 
ऊंचा बोलते थे बहुत


सहेलियां 

अब भी एक-दूसरी के जीवन में 
बनी हुई है उनकी जरूरत 
बीते समय के पन्नों को पलटते हुए कभी 
झांक जाता है जब 
किशोरपने का वह जाना-पहचाना चेहरा 
मुस्कान की एक रेखा 
देर तक पसरी रहती है होठों पर 

अनेक बार 
मन ही मन 
अनेक लंबे पत्र लिखे उन्होंने 
इच्छाओं की उड़ानों में 
कई बार हो आती हैं एक-दूसरी के घर 

खो जाती हैं 
एक-दूसरी के काल्पनिक सुखों के संसार में 
सचमुच के मिलने से बचती हैं 

एक-दूसरी के सुख के भ्रम में रहना 
कहीं थोड़ी सी उम्मीद को बचा लेना भी तो है


बेकार की कविताई

कविता करना भी कितना बेकार का काम है 
स्त्री होकर भी करना कविता तो 
घोर अनर्थ करना है 
कविता से न चूल्हा जलता है 
न घर चलता है 
बच्चे नहीं सोते मां की लिखी कविता सुन कर 
उन्हें लोरियां सुननी हैं 
जिनमें परियों की बातें हों 
जिनमें चांद के किस्से हों 
मां की कविता में जीवन का खटराग है 
कविता करना भी कितना बेकार का काम है

देवयानी भारद्वाज

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