Saturday, 6 September 2014 1 comments

“रवीन्द्र की कला गति और जीवन से भरपूर एक प्रवाह”- विनय उपाध्याय

            मित्रो! उदाहरण का यह अंक बहुत अलग और विशॆष है क्योंकि इस अंक में पहली बार एक नया प्रयोग किया जा रहा है। हम हमारे समय के महत्त्वपूर्ण और सबके प्रिय चित्रकार- कवि कुंवर रवीन्द्र की चित्र प्रदर्शनी आप से साझा कर रहे हैं। हमारे अपने वही कुंवर रवीन्द्र जिनके चित्र हम सब से संवाद करते जान पड़ते हैं, और जो हम में से बहुत से रचनाकार मित्रों के स्वप्रेरित हो बहुत ही आत्मीयता से अपना चित्र प्रसाद दे चुके हैं। यह चित्र प्रर्दशनी इस मायने भी अलग है कि इस में रवीन्द्र जी के बनाए विभिन्न कवियों की कविताओं के चित्र पोस्टरों के साथ हमारे समकालीन कुछ रचनाकार मित्रों के स्केचेज भी हैं।
          
           15 जून 1957 को मध्यप्रदेश के रीवा में जन्मे कुंवर रवीन्द्र बचपन में छतीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में रगे फिर लम्बे समय  भोपाल में रहे वहीं के माहौल ने उन में कला के प्रति रुझान पैदा किया और इसी रुझान ने 1975-76 में उनके हाथ रंग-कूंची थमा दिए और वे चित्रों के माध्यम से अपने व्यक्त करने लगे। 1979 रायपुर (छत्तीसगढ) में उनकी पहली चित्र-प्रदर्शनी लगी लेकिन उसके बाद खामोशी का एक लंबा अंतराल वे चुपचाप अपने कलाकर्म में लगे रहे। हिन्दी भवन भोपाल ( 1993) में आयोजित ‘दंगा और दंगे के बाद’ शीर्षक चित्र-प्रदर्शनी उनकी कला दूसरा महत्त्वपूर्ण पड़ाव रहा। कुंवर रवीन्द्र के कला-कर्म पर विस्तार से लिखे अपने कला समीक्षक- सम्पादक --कला समय भोपाल विनय उपाध्याय कहते हैं ,’कला के इन मायनों में अगर कुंवर रवीन्द्र (के. रवीन्द्र) के कृतित्व की पड़ताल करें तो भी एक मोटी बात तो प्रथम दृष्टया समझ आती है कि अपने स्वरुप में प्रतीकात्मक रहते हुए रवीन्द्र ने कविता हो या रेखांकन ,केंद्र में मनुष्य की भावनिष्ठ अन्भूतियो की बहुरंगी दुनिया को ही रचा है। मुझ जैसे बहुत से पाठक रहे होंगे जिनका भ्रम कवि और रेखांकनकार - चित्रकार को अलग -अलग स्तर पर पहचानने को लेकर रहा हो पर यह सच है कि अभिव्यक्ति के दोनों ही माध्यमो में रवीन्द्र की रचनात्मक साधना का बहुत परिष्कृत ,परिपक्व और आत्मीय रूप प्राप्त होता है। रवीन्द्र रेखांकन गढ़ते हुए भी किसी कविता को रचते होंगे और कविता को शब्द-शब्द पिरोते हुए भी वे एक रेखांकन से गुजरते होंगे ,यानी दो समानांतर यात्राओ के अनुभव को हम रवीन्द्र की कला कह सकते है। यह तथ्य रवीन्द्र के रेखांकनों और कविताओ को आमने- सामने रख कर भली तरह परखा जा सकता है। मनुष्य की दी हुई दुनिया के यथार्थ और विसंगतियों- विद्रूपों से उपजती रिएक्शन को रवीन्द्र शायद बासी होना नहीं देना चाहते। संवेदना की उस तीव्रता को वे कविता या रेखाओ में तुरत -फुरत कैद कर लेने में कोई चूक नहीं करते होंगे। अनुशासन चाहे रेखाओ का हो या कविता का उसमें अंतर्निहित भाव-छंद संवेदनायो को समृध्य ,अनुभव क्षेत्र को गहरा, तथा सोच के क्षितिज को विस्तृत बनता है। अपनी कला -रचना नें वे स्वयं जितने रसिक होते होंगे, पाठक -दर्शक भी कमोबेश उसी रसानुभूति से रूबरू होते होंगे। रवीन्द्र के पास इस रचाव के लिए कोई शास्त्र होगा ,या कोई निश्चित मानक अथवा उपकरण होंगें ऐसा मानना गलती होगी। शायद रवीन्द्र कला की अंतरनिर्भरता से गुजरते अपने इजहार को सामर्थ्य भर ये दो रूप देते होंगे। कभी शब्दों के बिना ,रेखाओ की गतियों में ये संवेग संस्कार पाते है तो कभी शब्दों की ओर से कविता की शक्ल में आकर इन्हे राहत मिलती है। सच तो यह है की दोनों ही स्थितियों में हमारा मन एक संप्रेषण से भर उठता है जो हमें भरपूर आश्वस्त करता है, संतुष्ट करता है। कह सकते है की रेखांकन और कविता दोनों में रवीन्द्र की भावुकता का वजन समान और हमारे लिए समरस होने की त्रुष्टि से भरपूर है।

रवीन्द्र की कला को गति और जीवन से भरपूर एक प्रवाह कहें तो अत्युक्ति नहीं। वे रेखाओ में जहाँ एक ओर प्रकृति और मनुष्य को जोड़ने की प्रक्रिया में आये अंग -प्रत्यंग,विक्षेप ,भंगिमा ,मोड़ तथा वक्र किसी न किसी गूढ़ प्रतीकों की भाव की अभिव्यन्जना करते है तो दूसरी ओर कविता में शब्दों के इस्तेमाल करने का कौशल पाठक की मनुष्य की दुनिया के गहवर में डूबने- उतराने का सहारा बनता है। रवीन्द्र अपनी कला में मानवीय जीवन के सच की पड़ताल करने को बेचैन नजर आते है। बिम्बों के जरिये समझाने की हर - संभव कोशिश करते है। “

          रवींद्र कविताएं भी लिखते हैं लेकिन मूलत: वे बड़े चित्रकार हैं  मुझे कविता से अधिक मुखर उनके चित्र लगते हैं , इसका अर्थ ये कदापि न लिया- समझा जाए कि उनकी कविताएं कहीं से कमज़ोर हैं । उनका चित्रकार मनुष्य और प्रकृति का गज़ब चितेरा है, इनकी कूंची इन्हें पूरा डूबकर और बहुत ही स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करती है जो पूरे मनोयोग और धैर्य के साथ मनुष्यता की तलाश करती है।

व्यक्ति का नाम नहीं काम बोलना चाहिए कुंवर रवीन्द्र का काम बोलता है । रायपुर (छत्तीसगढ़) – 1976 (एकल), ब्यौहारी (मध्यप्रदेश) – 1983 (एकल),   शहडोल (मध्यप्रदेश) – 1983 (समूह),विधानसभा सभागार, भोपाल (मध्यप्रदेश) -1985 (एकल), मध्यप्रदेश कला परिषद्, कला वीथिका, भोपाल (मध्यप्रदेश) – 1986 (एकल), “दंगा और दंगे के बाद”, हिंदी भवन, भोपाल (मध्यप्रदेश) – 1993 (एकल),   विवेकानंद सभागार, बेतूल (मध्यप्रदेश) – 1995 (एकल),“रंग जो छूट गया था”, संस्कृति भवन कला वीथिका, रायपुर (छत्तीसगढ़) – 2012 (एकल)

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सम्मान· सृजन सम्मान, मध्यप्रदेश-1995, कला रत्न, बिहार-1997
संप्रति: छत्तीसगढ़ विधानसभा सचिवालय में कार्यरत
ई-मेल-k.ravindrasingh@yahoo.com
मोबाईल-09425522569

“रवीन्द्र की कला गति और जीवन से भरपूर एक प्रवाह” - विनय उपाध्याय



चित्र प्रदर्शनी:  के. रवीन्द्र (कुंवर रवीन्द्र) 

































































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