Thursday, 1 October 2015

जन- जन के कवि - हरीश भादानी



 

हरीश भादानी

जन्म: 11 जून 1933

निधन: 2 अक्तूबर 2009

जन्म स्थान: बीकानेर, राजस्थान

कुछ प्रमुख कृतियाँ: अधूरे गीत (1959),सपन की गली (1961), हँसिनी याद की (1963), एक उजली नज़र की सुई (1966),सुलगते पिण्ड (1966), नष्टो मोह (1981), सन्नाटे के शिलाखंड पर (1982), एक अकेला सूरज खेले (1983), रोटी नाम सत है (1982), सड़कवासी राम (1985), आज की आंख का सिलसिला (1985), पितृकल्प (1991), साथ चलें हम (1992), मैं मेरा अष्टावक्र (1999), क्यों करें प्रार्थना (2006), आड़ी तानें-सीधी तानें (2006)

विविध: विस्मय के अंशी है (1988) और सयुजा सखाया (1998) के नाम से दो पुस्तकों में ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं तथा असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर प्रकाशित।


11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में आपका जन्म हुआ। आपकी प्रथमिक शिक्षा हिन्दी-महाजनी-संस्कृत घर में ही हुई। आपका जीवन संघर्षमय रहा । सड़क से जेल तक कि कई यात्राओं में आपको काफी उतार-चढ़ाव नजदीक से देखने को अवसर मिला । रायवादियों-समाजवादियों के बीच आपने सारा जीवन गुजार दिया। आपने कोलकाता में भी काफी समय गुजारा। आपकी पुत्री श्रीमती सरला माहेश्वरी ‘माकपा’ की तरफ से दो बार राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी है। आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे । कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी प्रोढ़शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें राजस्थानी में। राजस्थानी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता। ‘सयुजा सखाया’ प्रकाशित। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से ‘मीरा’ प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी(महाराष्ट्र), पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से ‘राहुल’, । ‘एक उजली नजर की सुई(उदयपुर), ‘एक अकेला सूरज खेले’(उदयपुर), ‘विशिष्ठ साहित्यकार’(उदयपुर), ‘पितृकल्प’ के.के.बिड़ला फाउंडेशन से ‘बिहारी’ सम्मान से आपको सम्मानीत किया जा चुका है । उनकी इच्छा के अनुरूप अंतिम संस्कार के स्थान पर उनके पार्थिव शरीर को सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए सौंपा जाएगा। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे भादानी ने हिन्दी के साथ राजस्थानी भाषा को भी संवारने का कार्य किया। राजस्‍थान के वि‍गत चालीस सालों के प्रत्‍येक जन आंदोलन में उन्‍होंने सक्रि‍य रूप से हि‍स्‍सा लि‍या था। राजस्‍थानी और हिंदी में उनकी हजारों कवि‍ताएं हैं। ये कवि‍ताएं दो दर्जन से ज्‍यादा काव्‍य संकलनों में फैली हुई हैं। मजदूर और कि‍सानों के जीवन से लेकर प्रकृति‍ और वेदों की ऋचाओं पर आधारि‍त आधुनि‍क कवि‍ता की प्रगति‍शील धारा के नि‍र्माण में उनकी महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी। इसके अलावा हरीशजी ने राजस्‍थानी लोकगीतों की धुनों पर आधारि‍त उनके सैंकड़ों जनगीत लि‍खें हैं जो मजदूर आंदोलन का कंठहार बन चुके हैं।  उनका सरल और निश्चल व्यक्तित्व बीकानेर वासियों को बहुत पसन्द आता है। भादानीजी में अहंकार बिल्कुल नहीं है।  पिता के सन्यास लेने से भादानीजी अपने बचपन से ही काफी असन्तुष्ट लगते हैं और इस आक्रोश और असंतोष के फलस्वरूप उनका कोमल हृदय गीतकार कवि बना। छबीली घाटी में उनका भी विशाल भवन था। वह सदैव भक्ति संगीत और हिंदी साहित्य के विद्वानों से अटा रहता था। हरीश भादानी प्रारंभ में रोमांटिक कवि हुआ करते थे। और उनकी कविताओं का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर एकसा पड़ता था। भादानी के प्रारंभिक जीवन में राजनीति का भी दखल रहा है। लेकिन ज्यों-ज्यों समय बीतता गया हरीश भादानीजी एक मूर्धन्य चिंतक और प्रसिद्ध कवि के रूप में प्रकट होते गएइनके व्यक्तित्व में कोई छल छद्म या चतुराई नहीं है।

उनकी तीसरी बरसी पर लिखे आलेख में अरुण माहेश्वरी कहते हैं,’सचमुच इससे कठिन शायद ही कोई दूसरा काम हो सकता है कि एक बेहद मासूम, सरल और सीधे आदमी को गहराई से समझा जाए। किसी कपटी, कठिन और टेढ़े चरित्र की गुत्थियों को खोलना आसान होता है। उसमें बहुत कुछ ऐसा होता है जो खोले जाने की अपेक्षा रखता है, पर्दे के पीछे छिपा होता है। लेकिन एक पूरी तरह से पारदर्शी जीवन को और गहरे तक समझने की सायास कोशिश कितनी दुष्कर हो सकती है, आज जब मैं हरीश जी के व्यक्तित्व के बारे में लिखने बैठा हूं तब पता चल रहा है। अनंत तिकड़मों और स्वार्थों में डूबे इस संसार में कोई योजनाविहीन नि:स्वार्थ जीवन ही हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती है, हरीश जी की स्मृतियों से उनकी कोई तस्वीर बनाने की कोशिश में खुद को सबसे अधिक इसी चुनौती से जूझता हुआ पाता हूं।"

    उनके लिखे आलेक के कुछ सम्पादित अंश यहां प्रस्तुर करने का मोह नहीं छोड़ पा रहा हूं। उनके ही शब्दों में,’जब से हमने हरीश जी को जाना, हमेशा उन्हें आर्थिक संकटों से जूझते हुए ही जाना। अर्थ का विषय शायद उनके लिये किसी बला की तरह था। वे उससे दुखी हो सकते थे, उसके टल जाने की प्रार्थना कर सकते थे, लेकिन उससे मुक्ति का उनके पास कोई उपाय नहीं था। एक समय वे कवि सम्मेलनों के बड़े कवि थें, लेकिन कवि सम्मेलन उनके लिये थे, वे कभी कवि सम्मेलनों के नहीं हुए। राजस्थान का बच्चन और नीरज कहलाना उन्हें प्रिय हो सकता था, लेकिन कविसम्मेलनी कहलाना कत्तई नहीं। अपनी गायकी के लिये उनके निकट अज्ञेय जी की इतनी सी प्रशंसा ही काफी थी कि हरीश भादानी को सुन कर पता चलता है कि कविता को कैसे गाया जा सकता है। गीत और मंच उनके जीविकोपार्जन के साधन नहीं बने, कविगोष्ठियों और जन-आंदोलनों की वस्तु ही रहे। व्यवसायिक कवि सम्मेलनों में न जाने का निर्णय उन्होंने उस वक्त लिया जब वे अपने जीवन के सबसे गहरे और पीड़ादायी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे थे। आर्थिक परेशानी उन्हें मसीजीवी लेखन की ओर ले गयी, जयपुर में डेरा डाला। इसका भी रचनात्मक फल यह निकला कि प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों से जुड़ कर वे राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों के जन-जीवन से एकाकार होगये। गांव के लोगों के लिये उन्होंने ‘क्षण-क्षण उकल्या हूणियां’ के जिन दोहों की रचना की उन्हें नगाड़ों की थाप पर आज राजस्थान के सुदूर गांवों तक में गाया जाता है। इसी काल के अकेलेपन में उन्हें पौर्वात्य साहित्य, वेदों की कविता और उपनिषदों की जिज्ञासाओं ने भी काफी घेरा।

युवा दिलों पर राज करने वाला हरीश जी का यह रचना संसार हमारी तो साहित्यिक रुचियों के जन्म काल और युवा वय के नितांत आत्मीय और बेहद आनंददायी क्षणों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है और सही कहूं तो हमारे साहित्य-संस्कार का आधार है। इसीलिये इन रचनाओं के सम्मोहक वृत्तांत में मैं खोना नहीं चाहता। अगर इनकी ओर कदम बढ़ा दिये तो न जाने कहां का कहां चला जाऊं और इस भटकाव के चलते उनके पूरे व्यक्तित्व की जिन दूसरी खास बातों की ओर मैं संकेत करना चाहता हूं, उन्हें ही कहीं भूल न जाऊं!

जरूरत इस नयी रोशनी, शब्द और संबोधन के साथ खुद ही आदमी की सभ्यता और संस्कृति बनने का हौसला रखने वाले कवि की लगभग तीन दशकों तक फैली परवर्ती रचनाशीलता को टटोलने की भी है। इसे यदि उनकी पूर्व की रचनाशीलता का विपरीत न भी कहा जाए तो पूर्व से भिन्न तो कहना ही होगा, और इसीलिये यह बेहद गंभीर, जरूरी और जिम्मेदारीपूर्ण जांच की मांग करता है। इसके अभाव में कवि हरीश भादानी के कृतित्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा अव्याख्यायित रह जायेगा और उनके व्यक्तित्व का कभी भी समग्र आकलन नहीं हो पायेगा।" साभार http://www.pravakta.com/a-true-poet-harish-badani


जन- जन के कवि- हरीश भादानी

उनको जन पथ की मनुहारें व अन्य जन गीत
 

 

1.सड़कवासी राम !

    न तेरा था कभी

    न तेरा है कहीं

रास्तों-दर-रास्तों पर

    पाँव के छापे लगाते ओ, अहेरी !

खोल कर मन के किवाड़े सुन,

    सुन कि सपने की

सपने की किसी

सम्भावना तक में नहीं

    तेरा अयोध्या धाम.....

सड़कवासी राम !


    सोच के सिर मौर

    ये दसियों दसानन

और लोहे की ये लंकाएँ

    कहाँ है क़ैद तेरी भूमिजा

खोजता थक देखता ही जा भले तू

    कौन देखेगा,

    सुनेगा कौन तुझको ?

थूक फिर तू क्यों बिलोये राम.....

सड़कवासी राम !


    इस सदी के ये स्वयम्भू

    एक रंग-कूंची छुआकर

आल्मारी में रखें दिन

    और चिमनी से निकाले शाम.....

सड़कवासी राम !


    पोर घिस-घिस क्या गिने

    चौदह बरस तू

गिन सके तो

कल्प साँसों के गिने जा

        गिन कि कितने

        काट कर फैंके गए हैं

एषणाओं के जटायु ही जटायु

    और कोई भी नहीं

    संकल्प का सौमित्र

        अपनी धड़कनों के साथ

देख, वामन सी

    बड़ी यह जिन्दगी !

करदी गई है इस शहर के

    जंगलों के नाम.....

सड़कवासी राम ! ::


2-रोटी नाम सत है


रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है


ऐरावत पर इंदर बैठे

बांट रहे टोपियां

झोलिया फैलाये लोग

भूग रहे सोटियां

वायदों की चूसणी से

छाले पड़े जीभ पर

रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है

रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है


बोले खाली पेट की

करोड़ क्रोड़ कूडियां

खाकी वरदी वाले भोपे

भरे हैं बंदूकियां

पाखंड के राज को

स्वाहा-स्वाहा होमदे

राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है

रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है


बाजरी के पिंड और

दाल की बैतरणी

थाली में परोसले

हथाली में परोसले

दाता जी के हाथ

मरोड़ कर परोसले

भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है

रोटी नाम सत है

खाए से मुगत है


3-जो पहले अपना घर फूंके


जो पहले अपना घर फूंके,

फिर धर-मजलां चलना चाहे

    उसको जनपथ की मनुहारें !


    जनपथ ऐसा ऊबड़-खाबड़

    बँधे न फुटपाथों की हद में


    छाया भी लेवे तो केवल

    इस नागी, नीली छतरी की


    इसकी सीध न कटे कभी भी

    दोराहे-चौराह तिराहे


    दूरी तो बस इतनी भर ही

    उतर मिले आकाश धरा से


    साखी सूरज टिमटिम रातें

    घट-बढ़-घटते चंदरमाजी


    पग-पग पर बांवळिये-बूझे

    फिर भी तन से, मन से चाले


    उन पाँवों सूखी माटी पर

    रच जाती गीली पगडण्डी

    देखनहारे उसे निहारें

जो पहले अपना घर फूंके,

फिर धर-मजलां चलना चाहे

        उसको जनपथ की मनुहारें !


    इस चौगान चलावो रतना

    मंडती गई राम की गाथा


    एक गवाले के कंठो से

    इस पथ ही गूँजी थी गीता


    जरा, मरण के दुःख देखे तो

    साँस-साँस से करुणा बाँटी


    हिंसा की सुरसा के आगे

    खड़ा हो गया एक दिगम्बर


    पाथर पूजे हरी मिले तो

    पर्वत पूजूँ कहदे कोई


    धर्मग्रन्थ फैंको समन्दर में

    पहले मनु में मनु को देखो


    जे केऊ डाक सुनेना तेरी

    कवि गुरु बोले चलो एकला


    यूँ चल देने वाले ही तो

    पड़ती छाई झाड़-झूड़ते

        एक रंग की राह उघाड़ें


जो पहले अपना घर फूंके

फिर धर-मजलां चलना चाहे

        उसको जनपथ की मनुहारें ! ::


 4-रेत में नहाया है मन


रेत में नहाया है मन !

    आग ऊपर से, आँच नीचे से

    वो धुँआए कभी, झलमलाती जगे

        वो पिघलती रहे, बुदबुदाती बहे

        इन तटों पर कभी धार के बीच में

डूब-डूब तिर आया है मन

रेत में नहाया है मन !


    घास सपनों सी, बेल अपनों सी

    साँस के सूत में सात सुर गूँथ कर

        भैरवी में कभी, साध केदारा

        गूंगी घाटी में, सूने धारों पर

एक आसन बिछाया है मन

रेत में नहाया है मन !


    आँधियाँ काँख में, आसमाँ आँख में

    धूप की पगरखी, ताँबई, अंगरखी

        होठ आखर रचे, शोर जैसे मचे

        देख हिरनी लजी साथ चलने सजी

इस दूर तक निभाया है मन

रेत में नहाया है मन ! ::


 5-मैंने नहीं कल ने बुलाया है !

    मैंने नहीं कल ने बुलाया है !

    ख़ामोशियों की छतें,

    आबनूसी किवाड़े घरों पर,

    आदमी-आदमी में दीवार है,

तुम्हें छैनियाँ लेकर बुलाया है !

मैंने नहीं कल ने बुलाया है !


    सीटियों से

    साँस भर कर भागते

    बाजार-मीलों दफ़्तरों को

    रात के मुर्दे,

    देखती ठण्डी पुतलियाँ-

    आदमी अजनबी

    आदमी के लिए

तुम्हें मन खोल कर मिलने बुलाया है !

मैंने नहीं कल ने बुलाया है !


    बल्ब की रोषनी

    शेड में बंद है,

    सिर्फ़ परछाई उतरती है

    बड़े फुटपाथ पर,

    ज़िन्दगी की ज़िल्द के

    ऐसे सफ़े तो पढ़ लिए

तुम्हें अगला सफ़ा पढ़ने बुलाया है !

मैंने नहीं कल ने बुलाया है ! :


 6-क्षण-क्षण की छैनी से

क्षण-क्षण की छैनी से

        काटो तो जानूँ!


    पसर गया है घेर शहर को

    भरमों का संगमूसा

    तीखे-तीखे शब्द सम्हाले

    जड़ें सुराखो तो जानूँ !


क्षण-क्षण की छैनी से.....


    फेंक गया है बरफ छतों से

    कोई मूरख मौसम

    पहले अपने ही आँगन से

    आग उठाओ तो जानूँ!

क्षण-क्षण की छैनी से.....


चौराहे पर प्रश्न चिह्नसी

    खड़ी भीड़ को

    अर्थ भरी आवाज लगाकर

    दिशा दिखाओ तो जानूँ !


क्षण-क्षण की छैनी से

    काटो तो जानूँ ! ::


7-कोलाहल के आंगन


दिन ढलते-ढलते

कोलाहल के आंगन

सन्नाटा

रख गई हवा

          दिन ढलते-ढलते


दो छते कंगूरे पर

दूध का कटोरा था

धुंधवाती चिमनी में

उलटा गई हवा

          दिन ढलते-ढलते


घर लौटे

लोहे से बतियाते

प्रश्नों के कारीगर

आतुरती ड्योढ़ी पर

सांकल जड़ गई हवा

          दिन ढलते-ढलते


कुंदनिया दुनिया से

झीलती हक़ीक़त की

बड़ी-बड़ी आंखों को

अंसुवा गई हवा

          दिन ढलते-ढलते


हरफ़ सब रसोई में

भीड़ किए ताप रहे

क्षण के क्षण चूल्हे में

अगिया गई हवा

          दिन ढलते-ढलते


8-सुई


सुबह उधेड़े शाम उधेड़े

बजती हुई सुई


          सीलन और धुएं के खेतों

          दिन भर रूई चुनें

          सूजी हुई आंख के सपने

          रातों सूत बुनें

आंगन के उठने से पहले

रचदे एक कमीज रसोई

          एक तलाश पहन कर भागे

          किरणें छुई-मुई

          बजती हुई सुई


धरती भर कर चढ़े तगारी

बांस-बांस आकाश

फरनस को अगियाया रखती

सांसें दे दे घास


सूरज की साखी में बंटते

अंगुली जितने आज और कल

          बोले कोई उम्र अगर तो

          तीबे नई सुई

          बजती हुई सुई


9-सड़क बीच चलने वालों से


सड़क बीच चलने वालों से

    क्या पूछूँ.....क्या पूछूँ ?


    किस तरह उठा करती है

    सुबह चिमनियों से

    ड्योढ़ी-ड्योढ़ी

    किस तरह दस्तकें देते हैं

    सायरन.....सीटियां.....क्या पूछूँ ?

सड़क बीच चलनेवालों से

    क्या पूछूँ.....क्या पूछूँ ?


    कब कोलतार को

    आँच लगी ?

    किस-किसने जी

    किस-किस तरह सियाही ?

    पाँवों की तस्वीर बनी

    कितनी दूरी के

    बड़े कैनवास पर.....क्या पूछूँ ?

सड़क बीच चलने वालों से

    क्या पूछूँ.....क्या पूछूँ ?


    कैसे गुजरे हैं दिन

    टीनशेड की दुनिया के ?

    किस तरह भागती भीड़

    हाँफती फाटक से ?

    किस तरह जला चूल्हा ?

    क्या खाया-पिया ?

    किस तरह उतारी रात

    घास-फूस की छत पर.....क्या पूछूँ ?

    सड़क बीच चलने वालों से

    क्या पूछूँ.....क्या पूछूँ ?


पूछूँ उनसे

चलते-चलते जो

ठहर गए दोराहों पर


    पूछूँ उनसे

    किस लिए चले वे

    बीच छोड़, फुटपाथों पर

उस-उस दूरी के

आस-पास ही

अगुवाने को

खड़े हुए थे गलियारे


    उनकी वामनिया मनुहारों पर

    किस तरह

    कतारें टूट गई.....क्या पूछूँ


सड़क बीच चलने वालों से

    क्या पूछूँ.....क्या पूछूँ ? ::


10-इसे मत छेड़ पसर जाएगी


इसे मत छेड़ पसर जाएगी

रेत है रेत बिफर जाएगी


कुछ नहीं प्यास का समंदर है,

जिन्दगी पाँव-पाँव जाएगी


धूप उफने है इस कलेजे पर

हाथ मत डाल ये जलाएगी


इसने निगले हैं कई लस्कर

ये कई और निगल जाएगी


न छलावे दिखा तू पानी के

जमीं-आकाश तोड़ लाएगी,


उठी गाँवों से ये ख़म खाकर

एक आँधी सी शहर जाएगी


आँख की किरकिरी नहीं है ये

झाँकलो झील नजर आएगी


सुबह बीजी है लड़के मौसम से

सींच कर साँस दिन उगाएगी


काँच अब क्या हरीश मांजे है

रोशनी रेत में नहाएगी


इसे मत छेड़ पसर जाएगी

रेत है रेत बिफर जाएगी ::


 11-हद, बेहद दोनों लांघे जो !

    हद, बेहद दोनों लांघे जो !


    एकल मैं बज-बजता रहता

    थापे कोई फटी पखावज

    इसका इतना आगल-पीछल

    रीझे माया, सीझे काया


देखा चाहे सूरदास जो

इस हद में भी दिख-दिख जाएं-

मीड़, मुरकियों की पतवाले

निरे मलंगे अद्भुत विस्मय !


    ऐसों से बताये वो ही

    गांठे सांकल बांवळियों की

    इस हदमाते कोरे मैं को

    कीकर के खूँटे बाँधे जो !

हद, बेहद दोनों लांघे जो !


    आगे बेहद का सन्नाटा,

    खुद से बोल सुनो खुद को ही

    यहाँ न सूरज पलकें झपके

    रात न पल भर आँखें मूँदे

धाड़े तन सी हवा फिरे है

जहाँ भरी जाए हैं साँसें,

ऐसे में ही गया एक दिन

यम की ड्योढ़ी पर नचिकेता

    एक बळत के पेटे लेली

    सात तलों की एकल चाबी

    यह चाबी लेले फिर कोई

    ऐसा ही कुद हठ साधे जो !

हद-बेहद दोनों लांघे जो !


    बेहद की कोसा के उठते

    दीखन लागे वह उजियारा

    जिसका आदि न जाने कोई

    इति आगोतर से भी आगे


यह रचना का पहला आँगन

उसका दूजा नाम संसरण

प्राण यही, विज्ञान यही है


    रचे इसी में अनगिन सूरज

    इस अनहद में नाद गूँजते

    नभ-जल-थल चारी सृष्टि के

    हो जाए है वही ममेतर

    हद-बेहद दोनों रागे जो !


हद, बेहद दोनों लाँघे जो ! ::


12-हदें नहीं होती जनपथ की


हदें नहीं होती जनपथ की

वह तो बस लाँघे ही जाए.....

    एकल सीध चले चौगानों

    चाहे जहाँ ठिकाना रचले


    अपनी मरजी के औघड़ को

    रोका चाहे कोई दम्भी


    चिरता जाए दो फाँकों में

    ज्यों जहाज़, दरिया का पानी


इससे कट कर बने गली ही

कहदे कोई भले राजपथ


इससे दस पग भर ही आगे

दिख जाए है ऊभी पाई ।


आर-पारती दिखे कभी तो

वह भी तो कोरा पिछवाड़ा


    इन दो छोरों बीच बनी है

    दीवारों की भूल भूलैया


    इनसे जुड़-जुड़कर जड़ जाएँ

    भीम पिरालें, हाथी पोलें


    ये गढ़-कोटे ही कहलाए

    अब ‘तिमूरती’ या ‘दस नम्बर’


इनमें सूरज घुसे पूछ कर,

पहरेदार हवा के ऊपर,


खास मुनादी फिरे घूमती

कोसों दूर रहे कोलाहल


ऐसे अजब घरों में जी-जी

आखिर मरें बिलों में जाकर


    जो इतना-सा रहा राजपथ

    उसकी रही यही भर गाथा


    आँखों वाले सूरदास जी

    कुछ तो सीखें इस बीती से


    पोल नहीं तो खिड़क खोल कर

    अरू-भरू होलें जो पल भर

        दिख जाए वह अमर चलारू

        चाले अपना जनपथ साधे !


    हदें नहीं होती जनपथ की

    वह तो बस लाँघे ही लाँघे !


जनपथ जाने तुम वो ही हो

सोच वही, आदत भी वो ही


यह तो अपने अथ जैसा ही

तुम ही चोला बदला करते


लोकराज का जाप-जापते

करो राजपथ पर बटमारी

    इसका नाभिकुंड गहरा है

    सुनो न समझो, गूँजे ही है


    लोकराज कत्तई नहीं वह

    देह धँसे कुर्सी में जाकर


    राज नहीं है काग़ज़ ऊपर

    एक हाथ से चिड़ी बिठाना

राज नहीं आपात काल भी

किसी हरी का नहीं की रतन

विज्ञानी जन सुन लेता है

यन्त्रों तक की कानाफूसी

‘रा’ रचता है कौन कहाँ पर

क्यों छपता है ‘राम’ ईंट पर

    सजवाते रहते आँगन में

    पाँचे बरस चुनावी मेला


    झप-दिपते, झप-दिपते में यह

    खुद को देखे, तुझको देखे


    भरी जेब से देखे जाते

    झोलीवाला पोंछा, पुरजा

कल तक जो केवल चीजें थी

आदमकद हो गई आज वे

चार दशक की पड़ी सामने

संसद में सपनों की कतरन

अब तो ये केवल दरजी हो

अपनी कैंची, सूई, धागा

    लो अब तुम ही देखे जाओ

    कैसे काट, उधेड़ें, साधे ?

हदें नहीं होती जनपथ की

वह तो बस लाँघे ही लाँधे ! ::


-हरीश भादानी

(चित्र साभार गूगल)

4 comments:

GathaEditor Onlinegatha said...

Looking to publish Online Books, in Ebook and paperback version, publish book with best
Publish Online Books|book Publishing company in India

Neeraj Kumar Neer said...

इतनी अच्छी कवितायें पढ़वाने के लिए आभार आपका ...

Braj Ratan Joshi said...

बहुत खूब।

Braj Ratan Joshi said...

बहुत खूब।

Post a Comment

Popular Posts

©सर्वाधिकार सुरक्षित-
"उदाहरण" एक अव्यवसायिक साहित्यिक प्रयास है । यह समूह- समकालीन हिंदी कविता के विविध रंगों के प्रचार-प्रसार हेतु है । इस में प्रदर्शित सभी सामग्री के सर्वाधिकार संबंधित कवियों के पास सुरक्षित हैं । संबंधित की लिखित स्वीकृति द्वारा ही इनका अन्यत्र उपयोग संभव है । यहां प्रदर्शित सामग्री के विचारों से संपादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है । किसी भी सामग्री को प्रकाशित/ अप्रकाशित करना अथवा किसी भी टिप्पणी को प्रस्तुत करना अथवा हटाना उदाहरण के अधिकार क्षेत्र में आता है । किस रचना/चित्र/सामग्री पर यदि कोई आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें, उसे हटा दिया जाएगा।
ई-मेल:poet_india@yahoo.co.in

 
;