Tuesday, 12 August 2014

आखिर कब व अन्य कविताएं :राहुल देव

मित्रो! उदाहरण में इस बार हैं कविता के नवीनतम हस्ताक्षर राहुल देव। जिस अंदाज़ में राहुल का कवि अपने समय से मुठभेड़ करता है, लगता ही नहीं कि ये कविताएं एक नवांकुर की कलम है। अपनी कविताई के बारे में वे कविता में ही कहते हैं,"कविता फूट पड़ती है स्वतः अपने आप ही जैसे किसी ठूँठ मेँ अचानक कोँपले फूट पड़ें; या किसी जंगल मेँ झाड़ियों का एकदम उग आना ठीक उसी प्रकार कविता उग आती है" घटनाओं के घटित होने के समय उनका कवि एक तारीख की तरह घटनाओं में अपना हस्तक्षेप दर्ज़ ही नहीं कराता, बल्कि  समय की देहरी पर दस्तक देते हुए सवाल भी उठाता है। उसकी कलम दरिंदों की वासनायुक्त नज़रें को पकड़ती हुयी देखती हैं उन मदांध साड़ों का झुण्ड जो लूटता जा रहा इज्जत निर्भयाओं की। 

कवि का आत्मकथ्य


अगर विधिवत लिखने की बात हो तो मैंने लिखना सन 2005 में शुरू कर दिया था | कच्ची उम्र में अपनी कच्ची समझ या यूँ कह लें कि कच्चे-पक्के भावों-विचारों के साथ | शुरुवात कविता से हुई बाद में कहानियां भी लिखी | इस मामले में खुशकिस्मत रहा की मुझे शुरुआत से ही एकांत मिला, अच्छी किताबें पढ़ने को मिलीं और हमेशा अच्छे लोगों का सानिंध्य भी मिला | हिम्मत करके इधर उधर रचनाएँ भेजनी शुरू कीं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में छपा तो हिम्मत बंधी कि शायद थोड़ा बहुत ठीक ठाक लिख लेता हूँ | लिखना शुरू ही क्यों किया इसका कोई मुकम्मल जवाब में तलाश नहीं कर पाता | देखा जाए तो अभी तक मैंने बहुत कम कवितायेँ व कहानियां लिखी हैं | इसका कारण यह भी है कि मैंने कभी भी जबरदस्ती वाला लेखन नहीं किया | जब भी लगा कि अब लिखे बिना नहीं रहा जा सकता, तब लिखा | लेखकीय या कवि जीवन भी कितना अजीब टाइप का होता है | कितना कुछ हर वक्त इस खुराफ़ाती दिमाग में चला करता है जिसका कितना कम प्रतिशत कलम उसे कागज़ पर उतार पाती है !
मुझे पढ़ने का धुआँधार शौक है | लिखना मेरे लिए द्वितीयक कर्म है | अच्छा साहित्य पढ़ने से सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि उससे खुद के स्तर का पता लगता है कि अपन कितने पानी में हैं | इस दौरान कई बार अपना लिखा पलटकर पढ़ता हूँ तो लगता है अभी और बेहतर लिखना हो सकता है | कई बार तो छपी हुई कविताओं को भी संशोधित कर डालता हूँ, इसलिए भी अब मैं अपनी रचनाओं को पत्र-पत्रिकाओं में भेजने में कतराता रहता हूँ | शायद यह उम्र के साथ समझ की परिपक्वता का प्रभाव हो | अब लगता है साहित्य सृजन का सलीका जीवन की गहनता में छिपा होता है |
मेरा मानना है कि साहित्य आपके अंतर्जगत के बहुत गंभीर चिंतन, मनन और बाह्यजगत के तमाम प्रभावों की समन्वित परिणति होती है | आपका व्यक्तित्व अगर अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील है तो आपका कृतित्व आपको सहज ही ऊँचाईयां दिखलाता है | नैसर्गिक प्रतिभा कभी भी किसी पुरस्कार या पद आदि की मोहताज़ नहीं होती | आशावादी हूँ और मानवीय मूल्यों से ऊपर किसी वाद या धर्म को नहीं मानता | मैं कैसा लिख रहा हूँ, मेरे पाठकों की प्रतिक्रियाएं मुझे बता देती हैं और वही मेरी ख़ुशी और मेरी पूँजी है | मैं एक सीधा-साधा सच्चे हृदय वाला साधारण इंसान हूँ | मुझे बिन मांगें सलाह देने वाले और दोहरे चरित्र वाले लोगों से सख्त एलर्जी है |
यह गतिशील जीवन-जगत रहस्यधर्मीं है, समय प्रकृति की इस प्रयोगशाला में हमें बहुत कुछ सिखाता जाता है, अनुभवों के माध्यम से | यहाँ अच्छे लोग भी हैं और बुरे भी, यहाँ लोग मिलते भी हैं और बिछड़ते भी, यहाँ सुख भी है और दुःख भी | अक्सर बड़ी बड़ी खुशियों के इन्तजार में खुशियों के छोटे छोटे पल बीत जाते हैं | देखा जाए तो यह यात्रा बहुत लम्बी है और उम्र बहुत छोटी | फिर क्यों न हम नकारात्मक को छोड़कर सकारात्मक की डोर थामकर चलें | कुल जमा कहें तो फिलहाल इतना सा मेरा जीवन दर्शन है | शेष जीवन अपनी गति से गतिशील है ही, कहाँ तक चल पाऊंगा, यह भविष्य के गर्भ में है | 

राहुल देव :उ.प्र. के अवध क्षेत्र के महमूदाबाद कस्बे में 20 मार्च 1988 को का जन्म | शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ और बरेली कॉलेज, बरेली से | साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण में रूचि | अभी तक एक कविता संग्रह तथा एक बाल उपन्यास प्रकाशित | पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/ लेख/ कहानियां/ समीक्षाएं आदि का प्रकाशन | इसके अतिरिक्त समकालीन साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ में सहसंपादक | वर्ष 2003 में उ.प्र. के तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री द्वारा हिंदी के नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत, वर्ष 2005 में हिंदी सभा, सीतापुर द्वारा युवा कहानी लेखन पुरस्कार से तथा अखिल भारतीय वैचारिक क्रांति मंच, लखनऊ द्वारा वर्ष 2008 में विशिष्ट रचनाधर्मिता हेतु सम्मानित | सम्प्रति उ.प्र. सरकार के एक विभाग में नौकरी के साथ साथ स्वतंत्र लेखन में प्रवृत्त | 
संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203 
मो.– 09454112975
ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com


आखिर कब व अन्य कविताएं :राहुल देव


अपरिभाषित समय में


घटनाओं के घटित होते समय
तुम कहाँ थे ?
तारीखें गवाह हैं…

समय की देहरी पर
बिना दस्तक
आता है, घुस जाता है
सीधा हमारे दिमाग में
वह क्या है
वह कौन है
वह कहाँ है
कभी सोचा !

जीवन- गुलामी का जीवन
बाहर-भीतर चलते अंधड़
क्या अजीब माहौल है
यहाँ भय है, कुंठा है, त्रास है
जहाँ आदमी आदमी का ग्रास है,
कवितायेँ सहमी सी कोने में खड़ीं
शासन सत्ता बेखबर सो रही
राजनीति के काले अध्यायों के
पन्ने फाड़ते जा रहे दंगाई
धर्म तो खैर कब था ही यहाँ
दंगे- दंगों के बाद का सन्नाटा
और उस सन्नाटे को चीरता हुआ
बाज़ार निर्देशिकाओं का खुला आमंत्रण

अलमारियों में सजी हुई किताबों में दर्ज
सच्चाइयों पर जमी हुई
गर्द की मोटी परत
मेज पर बिखरी हुई कलमों की
सूखी हुई रोशनाई
देख रही
मरे हुए युगपुरुषों की अतृप्त रूहें
बेचैन हैं कब्र से निकल आने को

इस भीषण समय में
सार्थक को बचा लेना
बचा लेना मेरे भाई
मेरे कवि- दोस्त !

बस फिर क्या था,
विश्व के कोने कोने में
इस तरह की गयीं तमाम प्रार्थनाओं के बाद
अँधेरे को चिढ़ाते हुए
निकल पड़े कुछ लोग
गांवों से- शहरों से

लोग जो सोये थे, सोये रहे
लोग जो तटस्थ थे
उन्होंने सड़कों पर यह जुलूस देखकर
अपनी खिड़कियाँ बंद कर लीं
लोग चलते जा रहे हैं
बढ़ते जा रहे हैं उनके कदम
देश की राजधानी की तरफ

इतिहास दूर खड़ा होकर
बड़ी उम्मीदों से देख रहा है उन्हें
अपनी बूढ़ी आँखों से
ज्यों-ज्यों मशालों के उजाले बढ़ रहे हैं
अँधेरा छंट रहा है

हमारे ही एक पुरखे ने
कभी कितना सही कहा था
साहित्य राजनीति को
राह दिखाने वाली मशाल है
साहित्य दिनोंदिन मरती जा रही
मनुष्यता की ढाल है

आज वह दिन आ ही गया
जिसका तुम्हें सदियों से इंतज़ार था
क्षितिज के गर्भ से उजालों का मसीहा
एक बार फिर-
बाहर निकलने को बेताब है !

आखिर कब !


दरिंदों की वासनायुक्त नज़रें
देखती हैं गुलाबो की छातियाँ
मदांध साड़ों का झुण्ड
लूटता जा रहा इज्जत निर्भयाओं की

क्या गाँव-क्या शहर
हर जगह वही चित्रपट

गाँव में बातें हुईं
शहर में मोमबत्तियां जलीं
विधानसभा में सवाल खड़े किये गये
मुआवजों से ज़िन्दगी का मोल
किया जा सका है क्या भला ?

गुम होती छायाएं
हो रही हत्याएं
चीखें- भयानक चीखें
गूँजती हर जगह

केले के पत्ते की तरह
फट रहा है धरती का हृदय
बारिश की टपकती बूँदों ने कहा-
आसमान रो रहा,
जहाँ देखो, भागते जा रहे लोग
यहाँ-वहां !

संवेदनाएं पक्षाघात से व्यथित
इंसानियत मरणासन्न
उफ़्फ़ !! कैसा समय है यह, यंत्रवत

मैं पूछता हूँ-
कब जागोगे तुम ?
कब होगा सवेरा ??
मान लो इस कवि की बात
अब तो !

चले जाओ, बचा लो खुद को
मैं देख रहा हूँ
उनके क़दमों को
जो अपने पागलपन में
सबकुछ राख कर चुकने के बाद
चले आ रहे हैं
तुम्हारे घर की तरफ़ !

देर मत करो मेरे हमदम
चिंता मत करो मेरे दोस्त
मैं जिंदा रहा ग़र तो
यहीं बैठा मिलूँगा तुम्हें
हमेशा की तरह
तुम्हारे पक्ष में खड़ी हुई
अपनी कविताओं के साथ !

कविता-1


कविता
फूट पड़ती है
स्वतः
अपने आप ही
जैसे किसी ठूँठ मेँ
अचानक कोँपले
फूट पड़ें;
या किसी जंगल मेँ
झाड़ियों का
एकदम उग आना
ठीक उसी प्रकार
कविता उग आती है
बगैर कुछ कहे
बगैर किसी भूमिका के
मेरे मस्तिष्क मेँ
और मैं
उसे सजा लेता हूँ
कागज के
किसी पन्ने पर !

कविता-2


कविता
आती ही नहीं है
लाना पड़ता है मुझे उसे
जबरन
जब सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता
तो कर देता हूँ ऊँगली को टेढ़ा

अब कविता आने की तैयारी में है

मैं अपने कुंद हुए मस्तिष्क के
घोड़े दौड़ाता हूँ
जोर लगाता हूँ
पैतरे आजमाता हूँ
जैसे कोई चतुर किसान
लौकी को इंजेक्शन लगाता है

कविता भी फूल जाती है
लौकी की तरह
और बस मैं

टाइप कर लेता हूँ उसे
अपने लैपटॉप पर

अब मैं खुश हूँ
और उसे लेकर चल दिया हूँ 
साहित्य के बाज़ार में बेचने के लिए !

राहुल देव

3 comments:

Ashok Kumar Pandey said...

राहुल के पास विचारों की ताक़त है और एक गहरा उद्वेग. यही उद्वेग कई बार शब्द स्फीति में परिणित होता है. उसके बावजूद कविताओं में बहुत ताक़त है. उन्हें बधाई.

vandana gupta said...

बेहतरीन कवितायें पढवाने के लिए आभार

विमलेश त्रिपाठी said...

प्रिय भाई आपकी कविताएं अच्छी लगीं.... लिखते रहें, आपसे हमें बहुत उम्मीदें हैं....।।

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