Wednesday, 5 October 2011

राजेश चढ्ढा की कविताएं

राजेश चड्ढ़ा
पिता- स्व. श्री ओमप्रकाश चड्ढा। माता- श्रीमती सरला देवी।
जन्म- 18 जनवरी, 1963 को हनुमानगढ़ में।
शिक्षा- एम.कॉम. एमजेएमसी।
लोकप्रिय उद्घोषक व शायर। सन 1990 से नियमितरक्तदान । अध्यक्ष , सिटिज़न एकलव्य आश्रम । पंजाबी, हिन्दी व राजस्थानी तीनों भाषाओं में कार्यक्रमों की प्रस्तुति में विशेष महारत। पंजाबी कार्यक्रम 'मिट्टी दी खुश्बू' पड़ोसी देशों में भी बेहद लोकप्रिय। इस कार्यक्रम पर कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से लघुशोध भी हुआ। प्रथम नियुक्ति सितंबर 1986 में उदयपुर आकाशवाणी में हुई। जनवरी 1991 से सूरतगढ़ आकाशवाणी में सेवारत। इस दौरान देश की नामचीन हस्तियों, पूर्व राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरमन, मशहूर शायर निदा फाजली, जन कवि गोपाल दास 'नीरज' , अर्जुन पुरस्कार विजेता तथा विश्व कप बैडमिंटन चैंपियन प्रकाश पादुकोण तथा सुप्रसिद्ध कॉमेंटेटर मुरली मनोहर मंजुल से रेडियो के लिए साक्षात्कार। 1980 से निरंतर सृजनरत । उन्हीं दिनों से हनुमानगढ़ की साहित्यिक गतिविधियों के संयोजन में प्रमुख भूमिका । अखिल भारतीय साहित्य-विविधा 'मरुधरा' के चार सम्पादकों में से एक। इस विविधा का लोकार्पण मशहूर साहित्यकार अमृता प्रीतम ने किया। उल्लेखनीय है कि आपकी कहानियां हिन्दी की नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं तथा कहानी लेखन के क्षेत्र में भी आप पुरस्कृत हो चुके हैं। वर्तमान में आकाशवाणी सूरतगढ़ (राजस्थान) में वरिष्ठ उद्घोषक।  सम्पर्क : दूरभाष- 094143 81939
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चुप्पियां
तुम्हारी चुप्पियों को
जब-
एक-एक करके
खोलता हूं ,
मैं-
अपने आप से भी-
बस-
उसी वक़्त
बोलता हूं ।
***


फादर्स डे -
आज
अचानक
पिता की तस्वीर को देखते हुए
मैंने मां के सामने स्वीकार किया-
कितने दिन बाद
इस तस्वीर को देर तक देखा है-
ऐसा नहीं है कि पिता स्मृति में नहीं रहे !
कभी उन्हें
अपने से अलग रख कर
मैंने सोचा ही कहां !
***


प्रतीक्षा
दूर पर्वत पार से-
जैसे
पहाड़ी राग-
बुलाएगा कभी,
इसी प्रतीक्षा में,
ओढ़ कर
सन्नाटे को-
बिछा हुआ हूं,
रेत पर-
कब से !
***


ख़याल
यूं ही तो नहीं होता,
कुछ भी.
कोई ख़याल,
किसी वजह की,
कोख़ में ही,
लेता है जन्म.
होता है बड़ा,
काग़ज़ के,
आंगन में
***


महाकथा
पुरुष-
रचता है कथाएं ।
स्त्री-
रचती है महाकथा ।
प्रत्येक महाकथा-
घटित होती है !
स्त्री की धुरी पर ।
***


क्षमादान
है कोई अज्ञात !
जो उतर आता है -
ज्ञात को स्थापित करने ।
सलीब के बदले
क्षमा दान ले कर ।
***


कुछ है
है कुछ ऐसा
जिसे-
मैं भी जानता हूं,
तुम भी जानाते हो।
कुछ ऐसा भी है
जिसे-
मैं भी नहीं जानता,
तुम भी नहीं जानते।
बहुत कुछ-
सिर्फ़ मैं जानता हूं,
तुम नहीं जानते।
है कुछ ऐसा भी
जिसे-
सिर्फ़ तुम जानते हो,
मैं नहीं जानता !
बेचैनी-
उसी से है।
***

1 comments:

Dr. N K Daiya said...

भाई नवनीत जी,
राजेश जी की इन सुंदर भावपूर्ण कविताओं के लिए बधाई। राजेश जी जैसे कुछ कवि हैं जो बिना किसी शोर के अपनी रचनात्मकता में संलग्न है, उदाहरण द्वारा ऐसे कवियों को प्रस्तुत किया जाएगा ऐसी आशा है।

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